गुरुवार, 28 अगस्त 2014

IRA-2013( INDIAN REALTY AWARDS-2013)

IRA-2013( INDIAN REALTY AWARDS-2013)

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

कंफ्यूजन एट ग्लोबल वार्मिंग



ग्लोबल वार्मिंग के जिस भयावाह रूप को अब तक हम हॉलीवुड की फिल्मों में देखते आए हैं, हॉलीवुड के ये भयानक दृश्य वास्तविकता में घटित हो जाएं तो आश्चर्यच की बात नहीं है, क्योंकि अमेरिका दुनिया में अपनी श्रेष्ठता सिद्घ करने एवं ग्लोबल वार्मिंग नामक डर को स्थापित करने के लिए इस तरह की कृतिमआपदाओं का सूत्रधार हो सकता है। आज अमेरिका के पास इस तरह की तकनीक है कि वह भूकंप, भूचाल, समुद्र में हलचल या पृथ्वी से आग निकलने जैसी आपदाओं की उत्पत्ति कर सकता है।
                                                  ग्लोबल वार्मिंग नामक जिस समस्या पर हायतोबा मच रही है, ऐसी कोई समस्या है ही नहीं। ग्लोबल वार्मिंग और कुछ नहीं, केवल अमेरिका की नौटंकी है। आज जिस तरह से अमेरिका की पूरे विश्व पर अपनी चौधराहट चलाने की लिप्सा बढ़ी है, उसने पूरी मानव जाति को संहार की कगार पर ला खड़ा कर दिया है। अपने स्वार्थ के लिए वह कुछ भी स्वांग रच सकता है। यह दुखद है कि लोग अमेरिका एवं उसके पिछलग्गु देशों के प्रायोजित कार्यक्रम ग्लोबल वार्मिंग के स्वांग को सच समझने लगे हैं। मुझे यह कहने में कतई खेद नहीं है कि एनजीओ और पर्यावरण सेक्टर से जुड़े लोगों ने अमेरिका और उसके द्वारा विश्व समुदाय को डराने के लिए किए गए दुष्प्रचारों को सबसे अधिक दुनिया भर में फैलाने का काम किया है। वास्तविकता में अमेरिका को छोड़कर किसी देश को भी ग्लोबल वार्मिंग को लेकर अपने एजेंडे का पता नहीं है। क्योटो प्रोटोकॉल के तहत चालीस औद्योगिक देशों के लिए, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए 1990 के आधार पर मानक तय किए गए थे, जिनमें भारत और चीन जैसे विकासशील देशों पर ग्रीन गैसों के उत्सर्जन को लेकर कोई भी बाध्यकारी पाबंदी नहीं थी। जानकारी के अनुसार अब तक बहुत से देश क्योटो प्रोटोकॉल पर अपनी सहमति जता चुके हैं, लेकिन ग्रीन हाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने अब तक क्योटो संधि के अनुसार अपने देश में नियम लागू नहीं किया है।
अमेरिका चाहता है कि प्रोटोकॉल के तहत विकासशील देशों पर पाबंदी लगायी जानी चाहिए, लेकिन वह स्वयं इससे बाहर रहे। एक तरफ अमेरिका दलील देता है कि चीन और भारत जैसे देशों पर भी बाध्यकारी पाबंदी होनी चाहिए, वहीं अमेरिका, कनाडा और जापान जैसे विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की तय सीमा मानने को तैयार नहीं हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि विकसित देश, भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों को दवाब में लाने के लिए सियासत कर रहे हैं। कोपेनहेगन में 'धरती को बचाने का अंतिम अवसरÓ घोषित किए जाने के बावजूद राष्ट्रों का महासम्मेलन बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे खत्म हो गया। दुनिया भर के पर्यावरणविदों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों और संगठनों के इस तमाशे को दुनिया ने बहुत ही गंभीरता के साथ देखा। दुनिया भर के मीडिया और अखबारों ने इसकी मामूली सी मामूली गतिविधि पर नज़र रखी। सबको इसके निष्कर्षों की भी प्रतीक्षा थी, लेकिन अंतत: यह प्रतीक्षा 'कंफ्यूशन एट कोपेनहेगनÓ के साथ समाप्त हो गयी। हमेशा की तरह यह वैश्विक सम्मेलन भी पुर्वानुमानों को झुठला नहीं सका। कोपेनहेगन सम्मेलन वास्तव में एक प्रायोजित कार्यक्रम था, जिसका मकसद यह स्थापित करना था कि मानवजन्य कार्बन उत्सर्जन सारी दुनिया के लिए खतरा बन चुका है।
अलगोर की बहुचर्चित फिल्म an in convenient truth अमेरिका को दुनिया पर राज करने का एक असाधारण मुद्दा दे दिया। अमेरिका ने इस मुद्दे को भुनाने के लिए बड़े प्रायोजित तरीके से कार्य किया और देखते-देखते दुनिया के सभी हिस्सों में यह आम समझ बनने लगी कि धरती गर्म हो रही है और उसका कारण मानव जनित उत्सर्जित कार्बनडाईऑक्साइड एवं ग्रीन हाउस गैसे हैं। ग्लोबल वार्मिंग नामक यह जिन्न अचानक छोटे-छोटे शहरों से लेकर कोपेनहेगन तक चर्चा, गोष्ठी, प्रदर्शनों का कारण बनने लगा। अन्त: वही हुआ, जिसकी पटकथा अमेरिका पहले ही लिख चुका था। विकासशील देशों की पुरानी तकनीकों पर आधारित उद्योगों के माथे पर यह ठीकरा फोड़ा जाने लगा, कहा जाने लगा कि शहर से लेकर ध्रुवीय प्रदेशों तक इनके द्वारा किए जा रहे प्रदूषण और ग्रीन गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, पूरी पृथ्वी बाढ़ और भयानक अकाल की ओर बढ़ रही है, जबकि हकीकत इससे इतर है। हो सकता है कि इन उद्योग धंधों के कारण स्थानीय स्तर पर प्रदूषण और तापमान में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन इन उद्योग-धंधों को ग्लोबल वार्मिंग से जोडऩा विकसित राष्ट्रों की एक सोची-समझी साजिश है। इसे समझने के लिए अगर आप पिछले सौ सालों के आंकड़े देखें तो वैश्विक तौर पर शहरों का औसत तापमान बढ़ा है, लेकिन गांवों के औसत तापमान में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है तो फिर धरती गरम कैसे हो रही है?


वास्तव में वायुमंडल में उपस्थित मुख्य घटक ग्रीन हाउस गैस, कार्बनडाईऑक्साइड का मुख्य स्रोत मानव उत्सर्जित कार्बनडाईऑक्साइड (एंथ्रोपोजेनिक सीओटू) न होकर प्राकृतिक क्रियाओं से उत्पन्न कार्बनडाईऑक्साइड है, जो कि नैसर्गिक घटनाओं से कम-ज्यादा होती रहती है। मानव द्वारा उत्सर्जित कार्बनडाईऑक्साइड वायुमंडल की कुल उत्सर्जित मात्र से इतनी कम है कि उसका प्रभाव नगण्य है। 97 फीसदी कार्बनडाईऑक्साइड तो पृथ्वी के 70 फीसदी हिस्से में फैले समुद्र में घुली हुई कार्बनडाईऑक्साइड है। समय-समय पर सौर मंडल में होनी वाली गतिविधियों के कारण से पृथ्वी की सतह के तापमान में परिवर्तन होता रहता है, जिससे गर्म होने पर समुद्र में घुली हुई कार्बनडाईऑक्साइड वायुमंडल में आ जाती है और सतह ठंडी होने पर वापस समुद्री जल में घुल-मिल जाती है। इसका एक अच्छा उदाहरण 1880 से 1940 के बीच का समय है, जिसमें वैश्विक औसत तापमान 0.5 डिग्री सेंटीग्रेट बढ़ गया था। जर्मन वैज्ञानिक ई जी बेक का 2007 का शोध पत्र बताता है कि 1840 के वायुमंडल में सीओटू का घनत्व 290 पीपीएमवी (पार्ट्स पर मिलियन वॉल्यूम) से अत्यधिक बढ़कर 1940 में 440 पीपीएमवी हो गया था, जो आज की तारीख में कथित तौर पर उपस्थित सीओटू के घातक घनत्व से भी 60 पीपीएमवी ज्यादा था। वैज्ञानिक मारलेंड जी एन्फ्रेस एंड बोडेन के 2006 का एक शोध बताता है कि तब मानव जनित कार्बन उत्सर्जन आज की तुलना में 30 गुना कम था। 1990 के शोध में यह बात सामने आयी कि 1949 से 1970 के बीच वैश्विक तापमान औसत लगभग 0.3 डिग्री सेल्सियस कम हो गया और वायुमंडल में कार्बनडाईऑक्साइड का स्तर घटकर 330 पीपीएमवी हो गया। एंडरसन व अन्य वैज्ञानिकों के द्वारा 2004 में प्रकाशित अन्य शोध पत्र भी यही बात बर्फीले प्रदेशों के बारे में कहते रहे हैं। फ्रिश क्रिस्टेंशन एवं लासेन ने मिलकर 1991 में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत किया, जिसने आधुनिक विज्ञान की नई शाखा को जन्म दिया, जिसे आज हम 'कॉस्मोक्लाइमेटोलॉजीÓ के नाम से जानते हैं। स्वेन मॉर्क द्वारा संपादित 2007 के इस दस्तावेज में उन्होंने अंतर ब्रह्मïांडीय गतिविधियां, सोलर गतिविधियां और धरती की सतह के तापमान के गहरे अंतर संबन्धों को रेखांकित करते हुए कहा कि सूर्य ही नहीं, बल्कि ब्रह्मïांडीय विकिरण, जो हमारे वायुमंडल में प्रवेश करती हैं, मुख्यत: हमारे मौसम परिवर्तन सहित पर्यावरण के अन्य कारकों को प्रभावित करती हैं। इन परिवर्तनों को न केवल सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र, बल्कि हमारे सौर मंडल की हमारी आकाश गंगा में परिवर्तन होता है। मिल्की-वे में उपस्थित कॉसमिक डस्ट और नोवा जैसी परिस्थितियों की निकटता के सम्मिलित परिणाम हमारी पृथ्वी को प्रभावित करते हैं। एल एफ खिलयुक्क एवं जी वी शिलिंगर का तो यह भी कहना है कि मानवीय कार्बनडाईऑक्साइड का उत्सर्जन अब तक के भू वैज्ञानिक कारणों से उत्पन्न संपूर्ण कार्बन डाईऑक्साइड का मात्र 0.00022 प्रतिशत ही है।


जरा सोचिए कि पृथ्वी के 71 फीसदी हिस्से पर जल है, बचे 29 फीसदी हिस्से में पर ज़मीन है और ज़मीन के मात्र 1.5 फीसदी हिस्से पर हम यानी मानव रहते हैं, जो कुल पृथ्वी का मात्र 0.5 हिस्सा है। इतना ही नहीं पृथ्वी पर रहने वाली लाखों प्रजातियों में मानव भी एक है, अत: यदि मानव चाहे भी तो वह इस पृथ्वी पर अपनी गतिविधियों से कोई खास प्रभाव नहीं डाल सकता। क्या चींटी हमारे घर के वातावरण को प्रभावित कर सकती है? नहीं न, फिर हम तो कुल पृथ्वी के सामने चींटी से भी तुच्छ वस्तु हैं तो मानव ग्लोबल वार्मिंग का कारण कैसे बन सकता है? यह सब अमेरिका एवं विकसित देशों का विकासशील देशों को अपने शिकंजे में कसने की एक इंटरनेशनल यानि आईपीसीसी स्टाइल है। बीते साल मालदीव के मंत्रीमंडल ने अपनी बैठक समुद्र तल में पानी के भीतर आयोजित की। क्या हमें नहीं मालूम कि पिछले 100 से 30 साल पहले तक मालदीव समुद्र से 20 से 30 सेंटीमीटर ऊपर आया है, नीचे नहीं गया है। शायद कोपेनहेगन सम्मेलन के पूर्व के अपने बहुचर्चित संपादकीय में 'द गार्जियनÓ ने सही लिखा था-विज्ञान में जटिलतायें हैं, लेकिन तथ्य स्पष्ट हैं। इस पूरे खेल से जो निष्कर्ष निकलता है, वह यह है कि विकसित देशी ग्लोबल वार्मिंग के सहारे विकासशील देशों पर अपनी कथित नयी औद्योगिक सभ्यता, जिसे क्लिन डेवलपमेंट मैकनिज़्म (सीडीएम) के नाम से जाना जाता है, को थोपना चाहते हैं। ग्लोबल वार्मिंग का स्वांग रच कर विकासशील देशों पर अपनी तकनीक को थोपना चाहते हैं। हम यानि विकाशील देशों को सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि अभी तक जो है, वह इस पूरी योजना का एक छोटा-सा हिस्सा भर है, हो सकता है अमेरिका अपने मंसूबे पूरे करने के लिए कोई विनाशक षडय़ंत्र रचे, जिसमें भूगर्भ से आग निकले, बे-मौसम पानी बरसे या ऐसी ही कोई अनहोनी घटना घटे, जो बड़ी संख्या में लोगों की अकाल मृत्यु का कारण बने, फिर अमेरिका निर्विवाद रूप से ग्लोबल वार्मिंग नामक दैत्य को स्थापित कर तमाम दुनिया पर हुकूमत कायम करने की चेष्टïा करे। इस सच को स्थापित करने के लिए यह काफी है कि इस प्रायोजित नाटक को चलाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से पिछले 6 वर्षों में 29 बिलियन डॉलर की रकम खर्च की जा चुकी है, जो चांद पर आदमी को ले जाने वाले अमेरिकन कार्यक्रम अपोलो-1969 के बजट से दोगुनी है। तो क्या अमेरिका ग्लोबल वार्मिंग के बाहने धरती पर कब्ज़ा करने का सपना देख रहा है? शायद यही सच हो।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

London A Classical City

हरिओम त्यागी
यूनाइटेड किंगडम की राजधानी लंदन, इंग्लैंड ही नहीं पूरे यूरोप में अपनी अलग पहचान रखता है। कभी लंदन की नींव रोमानियों द्वारा रखी गई थी। लंदन कई ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है जिनके बिना दुनिया का इतिहास अधूरा है। अंगेजी पुर्नाजागरण, औद्योगिक क्रान्ति जैसी घटनाओं में इस शहर ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। पहले एक छोटे से हिस्से को ही लंदन कहा जाता था। उस समय लंदन के नाम से जाना जाने वाला यह हिस्सा आज भी अपनी मध्यकालीन दीवरों में सिमटा होने से अलग पहचाना जा सकता है। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में इस पूरे शहर को लंदन के नाम से जाना जाने लगा। बाद में इसका विस्तार ग्रेटर लंदन के नाम से किया गया है। लंदन दुनिया का एक महत्वपूर्ण शहर है। यह विश्व का बिजनेस सेंटर, कला केंद्र, मनोरंजन एवं मीडिया केंद्र भी है। फैशन एवं कला के दीवाने यहां की व्यस्त गलियों में धमाल मचाते मिल जाएंगे। यह शहर कितना महत्वपूर्ण है इस बात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि यहां यूरोप की पांच सौ बड़ी कंपनियों में से सौ सबसे बड़ी कंपनियों के कार्यालय स्थिापित हैं। पर्यटकों के लिए भी यह कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां मौजूद विश्व की चार प्रमुख हैरिटेज साईट्स व शहर के अन्य खूबसूरत दृश्य आगन्तुओं पर सम्मोहन सा कर देते हैं।

इतिहास के पन्नों से
किसी भी शहर को बनने-संवरने में सैंकड़ों वर्षों का समय लगता है। लंदन का जो स्वरूप आज दिखलाई पड़ता है इसको बनने में भी हजारों वर्ष लगे हैं। इतिहासकारों के अनुसार 53 ई. में रोमानियों ने ब्रिटेन पर विजय पतका फेहराने के साथ एक बस्ती बसायी जिसका नाम लोनडियिम ) रखा गया, लेकिन मात्र सत्रह साल के बाद इस पर आईसनी जनजाति की महारानी बॉडिका  ने इस पर अपना अधिकार जमा लिया। रानी बॉडिका ने प्लानिंग कर इस बस्ती का विकास किया और इसे ब्रटैनिया ) के प्रान्त रोमन  की राजधानी घोषित कर दिया। 600 ई. में एंगलों सेक्सोन  ने इस पुराने रोमन शहर के ऊपरी छोर जहां आजकल कॉन्वेंट गार्डन है पर 1000 यार्ड की अवस्थापना की जिसको लंडनविक  के नाम से पुकार गया। इस स्थान के नाम पर आगे चल कर इस शहर का नाम लंदन पड़ा। इस निर्माण ने नदी पर बंदरगाह की तरह कार्य किया। यहां पर मछिलयों का व्यापार चलने लगा। बाद में वाइकिंग ने यहां पर अपना साम्रज्य स्थापित किया और उसने लंडनविक  निर्माण को हटवा दिया। इसकी दीवार को रोमन लॉडियम शहर की सुरक्षा के लिए प्रयोग किया गया। 886 में अलफ्रैड  ने यहां पर आधिपत्य जमाया और डैनिश नेताओं के साथ समझौता कर शान्ति स्थापित की। पुराने लंडनविक सिटी को एल्डविक सिटी में बदल दिया गया जो आज आल्डविच के नाम से विख्यात है और अब वेस्टमिनस्टर  में मौजूद है।
माध्यकालीन युग में लंदन की चार दीवरी पर आक्रमणकारियों के हमले के निशान स्पष्टï देखे जा सकते हैं। विलियम द्वितीय ने द ग्रेट एक्जीबिशन हॉल का निर्माण करवाया। इस समय तक लंदन व्यापारिक व व्यवसायिक रूप में अपनी पहचान बना चुका था।
1558 मे स्पेनिश की पराज्य के बाद इंगलैंड में राजनैतिक स्थिरता आ गयी, जिसने मंद पड़ी लंदन के विकास की गति को रफ्तार प्रदान की। 1603 में जेम्स चतुर्थ इंगलैंड के सिंहासन पर बैठा। जेम्स की कैथोलिक विरोधी नीतियों के चलते जनता में आक्रोश पनप गया और जिसने कत्लेआम जैसी घटना को अंजाम दिया। इस कत्लेआम के खून के छींटे लंदन की सरजमीं पर पड़े।
कत्लेआम के साथ ही लंदन को आग में झोंक दिया गया, जिसमें लंदन शहर के कई मुख्य हिस्से स्वाह हो गए। इस हादसे से उबरने में लंदन को दस साल का समय लगा। किंग चाल्र्स द्वितीय ने एक कमिशन गठित करके लंदन का नवनिर्माण करवाया। 18 वीं शताब्दी में सैम्यूअल जोन्सन जो इंगलिश भाषा शब्दकोष के रचियेता हैं, ने लंदन के बारे में लिखा है कि ''ऐसा कोई बुद्धिजीव ढूंढने से नहीं मिलेगा जो लंदन को छोडऩा चाहे, यदि कोई इंसान लंदन से ऊब जाए तो समझो वह जिंदगी से ऊब चुका है, लंदन सब के लिए रहने के लिए उत्तम स्थान है।
द्वितीय विश्व युद्ध में लंदन एक शक्ति के रूप में उभरा और देखते ही देखते विश्व का व्यस्तम शहर में शुमार हो गया। उस समय यहां ट्रैफिक इतना ज्यादा बढ़ गया कि शहर की मुख्य सड़कों पर जाम की स्थिति बनने लगी, जिसको देखते हुए संसार में पहला रैपिड ट्रांजिस्ट सिस्टम लागू किया गया। आज लंदन दुनिया के खूबसूरत शहरों में से एक है। यहां पर नेशनल गैलरी, नेच्यूरल ऐतिहासिक म्यूजियम, द लंदन आई, विक्टोरिया एंड अलबर्ट म्यूजियम, द टॉवर ऑफ लंदन, नेशनल मेरी टाइम म्यूजियम, मेदाम थोसेडे और ब्रिटिश म्यूजियम जैसे नायाब दर्शनीय स्थल हैं।

ब्रिटिश म्यूजियम
ब्रिटिश म्यूजियम लंदन में मौजूद मानवीय इतिहास व सांस्कृति का संग्रहालय है। यहां सात मिलियन से ज्यादा नायाब वस्तुओं को संग्रह किया गया है। यहां पर दुनिया भर के महाद्वीपों से लायी गई वे सभी वस्तुएं मौजूद हैं जो मानव जीवन से आज तक पृथ्वी पर बनाई गई या प्रयोग की गई हैं।
ब्रिटिश म्यूजियम की स्थापना सन्ï 1753 में की गई। इसकी स्थापना में सर हेन्स सलौने की मुख्य भूमिका रही है। यहां मौजूद लाईबे्ररी स्वाध्ययन करने वालों के लिए स्वर्ग है। यहां पर कार्ल माक्र्स, ऑस्कर वाइल्ड, महात्मा गांधी, मुहम्मद अली जिन्ना जैसी महान हस्तियों ने बैठकर अध्ययन किया है। सबसे पहले यह म्यूजियम मोंटयू हाउस  में शुरू किया गया और दो शताब्दी बाद इसका विस्तार कर इसको नया रूप रंग दिया गया।

द टॉवर ऑफ लंदन

यह सेंट्रल लंदन में एक ऐतिहासिक इमारत है। थॉमस नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित यह टॉवर लंदन के हेमलेट्स टॉवर को लंदन शहर से अलग करता है और यहां पर मौजूद स्थान को टॉवर हिल के नाम से जाना जाता है। यह एक किला है जिसको विलियम ने 1078 में बनवाया था। टावर में कई बिल्डिंग कॉम्पलेक्स हैं, जिनमें सुरक्षा के लिए कंक्रीट की दीवार के दो सुरक्षा घेरे बनाए गए हैं। किले के चारों तरफ दीवार का निर्माण सुरक्षा की दृष्टिï से किया गया है। जहां शुरू में किले का प्रयोग शाही लोगों के निवास के लिए हुआ वहीं बाद में इसका प्रयोग शक्तिशाली लोगों के लिए बंदीगृह के रूप में किया गया। इसका प्रयोग खजाने के रूप में, शास्त्रगृह के रूप में , टकसाल के रूप में भी किया गया। किंग विलियम ने इसका निर्माण थॉमस नदी पर लंदन को बाहारी आक्रमण से बचाने के लिए करवाया था। इस किले का आर्किटेक्ट गंडल्फ  रॉकचेस्टर के बिश्प  ने बनाया था। किले के निर्माण में प्रयुक्त होना वाला पत्थर फ्रांस से मंगवाया गया था। इस के निर्माण से कुछ कहानियां भी जुड़ी हुई हैं। उनमें से एक के अनुसार किले की चिनाई के लिए तैयार किया गये मिक्चर में बीस्ट अथवा जानवरों का खून मिलाकर तैयार किया गया है। कुछ लोग यह मानते है कि किले की मुख्य इमारत रोमन शासकों ने बनवाया था। विलियम सेक्सपीयर  ने अपने नाटक रिचर्ड तृतीय  में इसे जूलियस सीजर द्वारा बनाया गया बताया है। इस टॉवर को व्हाइट टॉवर भी कहा जाता है यह 90 फीट ऊंचा है। बाद के राजाओं ने इसका विस्तार किया और इसके चारों ओर दीवार का एक सुरक्षा घेरा बना कर इसकी सुरक्षा चाक-चौबंद की।

बकिंघम पैलेस

यह पैलेस लंदन का प्रतीक बन चुका है। पूर्वी दिशा में सिर उठाए खड़ा यह महल एड्वर्ड ब्लोरे ( द्वारा 1850 में निर्मित करवाया था। महारानी विक्टोरिया  प्रथम राजशाही सदस्य थीं जिसने बकिंघम पैलेस को अपना निवास स्थान बनाया। इसके बाद यह पैलेस राजशाही परिवार का ओपचारिक निवास बन गया। आज यह पैलेस शाही लोगों की गतिविधियों का केंद्र है तो दूसरी तरफ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बना हुआ है। चाहे लंदन में खूशी का माहौल हो या दु:ख का, बकिंघम पैलेस पर इसकी छाया स्पष्टï देखी जा सकती है। यह एक शानदार महल है, जिसका निर्माण बकिंघम के डूयक के लिए किया गया था। इस इमारत का वास्तु शिल्प जॉन नेश और एडवर्ड ब्लौरे थे। इस इमारत का उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त व बीसवीं शताब्दी के आरंभ में विस्तार किया गया। हालांकि इसका एक हिस्सा द्वितीय वल्र्ड वार में जर्मनी द्वारा की गई बम्बारी में क्षतिग्रस्त हो गया था। उन्नीसवीं शताब्दी में किंग चाल्र्स ने इसकी आन्तरिक साज-सज्जा को नया आयाम दिया। महल के अन्दर चमकदार रंगों का प्रयोग किया गया। इसकी दीवारें नीले व गुलाबी रंगों से रंग दी गई। इसकी कुछ साज-सज्जा एड्वर्ड चतुर्थ की सलाह पर भी की गई। एड्वर्ड की सलाह के अनुसार इसके कुछ हिस्से में क्रीम व सुनाहरे रंग के ताल-मेल से रंग किया गया। इसके कुछ कमरों को चीन की आवासीय वास्तु शिल्प का प्रयोग करके भी सजाया गया। इसका फर्नीचर ब्राइटन  और कार्लटन की शाही इमारतों के अनुसार बनवाया गया। महल में मौजूद गार्डन लंदन का सबसे बड़ा निजी गार्डन माना जाता है। यहां पर एक आर्टिफिशियल झील का निर्माण भी किया है। इस झील में पानी सर्पेन्ट नदी से आता है जो हाइडे पार्क  से होकर गुजरती है। इस पैलेस का प्रयोग शाही परिवार द्वारा किया जाता है। इस समय रानी ऐल्जाबेथ  द्वितीय, इस महल में निवास करती हैं। बकिंघम पैलेस दुनिया की सबसे प्रसिद्ध निवास स्थानों में से एक है।इस महल की शानो-शौकत आज भी अपना रूतबा कायम रखे हुए है। यह महल देखने में ही खूबसूरत नहीं है बल्कि मेहमान नवाजी में भी इसका कोई सानी नहीं है।पचास हजार से ज्यादा लोग हर साल इस महल के अतिथि बनते हैं और यहां की रंगीनयों व मौजमस्ती के गवाह बनते हैं।यहां के ये शाही मेहमान महल में होने वाली पार्टियों एव जलसों का जमकर लुत्फ उठाते हैं।

लंदन आई

लंदन आई को मिलैनियम व्हील के नाम से भी जाना जाता है। यह यूरोप का सबसे बड़ा झूला है। यू.के. में आने वाले पर्यटकों का यह सबसे पंसदीदा झूला है। जब यह बनाया गया था, उस समय यह दुनिया के सबसे बडा झूला था। इससे देखने हर साल तीन मिलियन से ज्यादा लोग आते हैं। इसकी खासियत यह है कि यह एक फ्रेम के ऊपर बनाया गया है और पूरा झूला एक तरफ फ्रेम पर टिका है। द लंदन आई, जुबली गार्डन में स्थित है। थॉमस नदी के दक्षिण किनारे पर स्थित, आगन्तुओं के लिए यह एक शानदार मौज-मस्ती का स्थान है। इस व्हील का डिज़ाइन आर्किटेक्ट डेविड मार्कस  जूलिया बारफिल्ड , मालकॉम कुक , मार्क स्पैरोवहॉक , स्टीवन चिल्टॉन  और निक  बैली ने बनाया है। इस व्हील में 32 एसी पेसंजर कैप्सूल हैं। एक कैप्सूल के अन्दर 24 लोग बैठ सकते हैं। इस का उद्घाटन तत्कालीन प्रधमंत्री टॉनी ब्लेयर ने दिसंबर 1999 में किया था पर कुछ तकनीकी समस्या के कारण इसको 2000 में ही जनता के लिए खोला गया था। आज लंदन में यह एक बड़ा लैंडमार्क बन चुका है। इसका संचाल मर्लिन एंटरटेंनमेंट नामक कंपनी करती है जबकि स्पॉन्सर्ड कंपनी ब्रिटिश एयरवेज है। पर्यटकों का 'लंदन आई जमकर मनोरंजन कर रही है।

वेस्टमिनस्टर एबबे

वेस्टमिनस्टर एबबे, वेस्टमिनस्टर में स्थित सेंट पीटर चर्च है। यह यहां का सबसे बड़ा गॉथिक चर्च है। यह एक ऐतिहासिक चर्च है। इसे लंदन का शाही चर्च का दर्जा प्राप्त है। रोमन शिल्प कला में बना यह वेस्टमिनस्टर महल से लगा हुआ है। एबबे के पश्चिम में बने टॉवर का निर्माण सत्तरहवी शताब्दी में किया गया है। यहां पर दस घंटियां लगी हुई हैं जो अपनी दिव्य आवाज से आगंतुओं के हृदय में शांती की लौ जलाती प्रतीत होती हैं। यहां पर अन्डरग्राउंड मैट्रो ट्रेन द्वारा भी पहुंचा जा सकता है। यहां पर एक चैरिटी स्कूल भी है। एबबे चर्च, कॉलेज का संचाल भी करता है। जहां चर्च है वह इस इमारत का सबसे पूराना स्थान है। माना जाता है कि यह ग्याहरवीं शताब्दी में स्थापित करवाया गया था। इस जगह एक म्यूजियम भी है जिसका अधिकतर भाग किंग एड्वर्ड ने बनवाया था।

लिसेस्टर स्क्वेयर

वेस्टमिनस्टर के पश्चिमी छोर पर स्थित लिसेस्टर स्क्वेयर फिल्म के शौकीन लोगों के लिए एक खास स्थान है। यहां पर फिल्मों के वल्र्ड प्रीमेयर होते हैं। यह स्थान लंदन का एंटरटेंमेंट सिटी के रूप में जाना जाता है।यहां पर कई सिनेमा घर, बार, क्लब, और रेस्तरां हैं। इसके साथ ही यहां पर कॉनवेंट गार्डन के पूर्व में चाइना टाउन है जो शापिंग करने वालों के लिए बेहतरीन जगह है। लॉन्ग सुपर स्ट्रीट में यू.के. के सबसे ज्यादा बार और रेस्टोरेंट हैं।ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट यूरोप की सबसे व्यस्त स्ट्रीट है इसकी लंबाई एक मील से ज्यादा है जो इसको दुनिया की सबसे लंबी शॉपिंग स्ट्रीट का दर्जा दिलाती है।

रॉयल एलबर्ट हॉल

लंदन दुनिया का सबसे क्लासिकल शहर है। यहां के लोग रंगीन मिजाजी एवं संगीत के शौकीन होते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप यहां बड़ी संख्या में संगीतकार व संगीत के कद्रदान हैं। यदि यह कहा जाए की यह विश्व की, संगीत की राजधानी है तो ज्यादा सही होगा। यहां पर मौजूद अनगिनित बैंड, संगीतकार, संगीत से जुडी कंपनियां इस बात की गवाह हैं कि लंदन के लोग संगीत के किस कद्र दीवाने हैं। यहां पर मौजूद बड़ी संख्या में ऑकेस्ट्रा व मौजूद संगीत हॉल्स ने लंदन को संगीतमय शहर का दर्जा दिलाया है।
यहां स्थित बारबिकन आर्टस सेंटर ,कैडागन हॉल और रॉयल एलबर्ट हॉल में गूंजती स्वर लहरियां लोगों के कर्णों में मिसरी की तरह घूलती रहती हैं। इतना ही नहीं यहां पर कई संगीत विद्यालय भी जिनमें रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक ग्यूइलधाल स्कूल ऑफ म्यूजिक एंड ड्रामा और ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ म्यूजिक मुख्य हैं।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

हरिद्वार






आजकल हरिद्वार चर्चा में है इसका कारण हैं यहां पर लगने वाला कुंभ मेला। हरिद्वार अर्थात हरि का द्वार अंग्रेजी में इसको 'गेट-वे टू गॉड भी कहा जाता है। हरिद्वार हिन्दूओं के सात महत्वपूर्ण धार्मिकस्थानों में से एक है। इसका पुराना नाम गंगा द्वार है। इसके पीछे कारण यह कि गंगा पहाड़ों से होती हुई सबसे पहले हरिद्वार में आकर समतल मैदान के क्षेत्र में प्रवेश करती है। अत: इस कारण इसको गंगाद्वार कहा गया है। हिन्दू मान्यता के अनुसार समुद्र मन्थन में निकले अमृत कलश को जब विष्णु के वाहन गरूड़ ले जा रहे थे, तो उस कलश से चार स्थानों पर अमृत, अमृतकलश से छिटक कर गिर गया था, जिनमें उज्जेन, नासिक, इलाहबाद के साथ हरिद्वार भी एक है। इसी कारण हर 3 वर्ष बाद क्रमश: इन स्थानों पर कुंभ मेला लगता है अर्थात हर 12 वर्ष बाद प्रत्येक स्थान पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। इलाहबाद में होने वाले कुंभ मेले के विषय में कौन नहीं जानता? लाखों श्रद्घालु इस मेले में गंगा में डुबकी लगाकर पवित्र स्नान करते हैं। वह जगह जहां हरिद्वार में अमृत गिरा था वह स्थान 'हर की पौड़ी पर ब्रहम कुण्ड के नाम से जाना जाता है। यह हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट है जहां पर हर वर्ष लाखों श्रद्घालु पवित्र गंगा में डुबकी लगा कर अपने कष्टों का निवारण करते हैं। लोगों की धरणा है कि गंगा में स्नान करने से पूर्व में किए गए पाप धुल जाते हैं। हरिद्वार को जिले के रूप में मान्यता 28 दिसंबर 1988 को मिली जो सहारनपुर मण्डल में आता था। 9 नवंबर 2000 में यह भारत का बना 27 वां प्रदेश उत्तराखण्ड का हिस्सा हो गया। आज हरिद्वार केवल धार्मिक ही नहीं एक बड़ा औद्योगिक शहर के रूप में भी उभर रहा है।

इतिहास के पन्नों से


राजकुमार भगीरथ ने अपने 60,000 पुरखों के अस्थिखण्ड विसर्जित करने के लिए हजारों वर्षों तक एक पैर पर खड़े हो कर शिव की तपस्या की तब कहीं जाकर गंगा शिव की जटाओं से निकल कर पृथ्वी पर अवतरित हुई। इसी कारण गंगा को भगीरथी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार हरिद्वार के अन्य नाम कपिलस्थान, गंगाद्वार और मायापुर भी हैं। यह चारधाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेश द्वार भी है। यदि यूं कहा जाए कि यह देव भूमि का प्रवेश द्वार है तो ज्यादा ठीक रहेगा। हरिद्वार का वर्णन महाभारत में भी आया है जब धोमिया ऋषि युधिष्ठïर को तीर्थ स्थानों के विषय में बताते हुए गंगाद्वार (हरिद्वार का पूर्व नाम) का जिक्र किया है। कनखल में युधिष्ठïर का मन्दिर भी है। ईसापूर्व 322 से 185 में हरिद्वार मौर्या शासक के अधिनस्थ रहा और उसके बाद कुषाण शासकों ने यहां राज्य किया। राजा हर्ष वर्धन के समय चीनी यात्री हुआनतसान जो 629 ईसवीं में भारत आया था, ने अपने यात्रा वर्णन में भी हरिद्वार का जिक्र मायापुर के रूप में किया है। सोहलवीं शताब्दी में अबुल-फजल द्वारा लिखा गया आईन-ए अकबरी में भी इस स्थान को मायापुर के नाम से उल्लेख किया गया है। आज के हरिद्वार की नींव आमेर के राजा मान सिंह ने रखी थी। मुगल बादशाह अकबर ने राजा मान सिंह की मृत्यु के बाद अपने हाथों से उसकी अस्थियां हर की पौड़ी स्थित ब्रह्म कुण्ड घट में विसर्जित की थी। हिन्दू ही नहीं सिख धर्म के मानने वालों के लिए भी यह स्थान श्रद्घा का केन्द्र है। सिखों के प्रथम गुरू नानक देव ने कुशवान घाट पर स्नान किया था जो अब 'गुरूद्वारा नानकवाराÓ के नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं सिखों के तीसरे गुरू श्री अमर दास ने तो 22 बार इस शहर का भ्रमण किया। यहां पर रहने वाले पण्डा यहां आने वालों का रिकोर्ड़ अपने बही खातों में रखते हैं। ये आपके पूर्वजों के विषय में पूरी जानकारी पलक झपकते ही आपको दे सकते हैं। संध्या प्रार्थना भगवान विष्णु के पत्थर पर छपे कदमों के निशान के सामने हर संध्या प्रार्थना की जाती है जिसको गंगा आरती भी कहा जाता है। हजारों श्रद्घालुओं की मौजूदगी में जब संध्या आरती होती है तो चारोंदिक एक स्वार्गिक वातावरण बन जाता है। भक्तगणों के कण्ठों से निकलने वाली स्वरलहरियां यहां आये आगन्तुओं पर जादूई प्रभाव छोड़ती हैं।

हर की पौड़ी


हिन्दू अवधारण के अनुसार हरिद्वार में पांच तीर्थ हैं जिनमें गंगाद्वार अर्थात हर की पौड़ी एक है। इस घाट का निर्माण राजा विक्रमादित्या ने कराया था। कहा जाता है कि राजा का भाई भरीथारी ने यहां आकर तपस्या की थी अत:राजा विक्रमादित्या ने उनकी याद में इस घाट करा निर्माण कराया था। यहीं पर ब्रहम कुण्ड़ घाट पर नहाने से मनुष्य सभी तरह के पापों से मुक्त हो जाता है ऐसा यहां आने वाले श्रद्घालुओं का मत है। शाम के समय गंगा मईया की आरती कर भक्त गण गंगा में पत्तो के उपर दीया जलाकर गंगा की धारा में बहा देते हंै दीये की लौ से निकली रौशनी की किरणे पानी से टकराकर एक आकर्षक चमक पैदा करती हैं जो गंगा की धारा के बहने से निकलती आवाज के साथ मिलकर एक अकल्पनीय प्रभाव आगन्तुओं तीर्थ यात्रियों पर छोड़ती है।

चण्डी देवी का मन्दिर

नील पर्वत के चोटी पर बना चण्डी देवी का मंदिर यहां आने वाले तीर्थ यात्रियों को अपनी और खींचता है। 1929 कश्मीर के राजा शुचात सिंह द्वारा निर्मित यह मन्दिर चण्डी घाट से तीन किलोमीटर की दूरी पर है। स्कन्द पुराण के अनुसार असुर राज शुंभ-अशुंभ के सेनापति चण्ड-मुण्ड को मारने के बाद देवी का नाम चण्डी देवी पड़ा। इस मन्दिर की स्थापना आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा आठवीं शताब्दी में की गई थी। यहां जाने के लिए पहले चण्डी घाट जाना पड़ता है उसके बाद पैदल या रोप -वे द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है। जंगली जानवरो के डर के कारण देवी के दर्शन सुबाह आठ बजे से शाम छह बजे तक ही किये जा सकते हैं।

मनसा देवी का मन्दिर


बिलवा पर्वत के चोटी पर बना मनसा देवी का मन्दिर हरिद्वार आने वालों के लिए महत्वपूर्ण आकर्षण होता है। तीर्थ यात्रियों का माना है कि यहां आने वालो की इच्छाएं पूरी होती हैं।मनसा देवी अपने भक्तों को कभी भी निराश नहीं करती हैं। इसके अलावा यहां पहुंचने के लिए उपलब्ध केबल कार बच्चों व रोमांच के शौकिनो को बरबस ही आकर्षित करती है। मुख्य मंदिर में देवी की दो मूर्तियां हैं एक तीन मुख व पांच हाथ वाली जबकि दूसरी के एक मुख आठ हाथ हैं।

दक्ष महादेव का मन्दिर
 
कनखल के उत्तर में स्थित दक्ष महादेव एक प्राचीन मन्दिर है। हिन्दू पुराणों के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति दक्षयाणी (सती)के पिता थे जो भगवान शिव की पत्नी थी। महाराज दक्ष ने एक यज्ञ किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को बुलाया गया किन्तु भगवान शिव को नहीं बुलाया गया। शिव ने इस बात से अपने आपको अपमानित महसूस किया किन्तु पत्नि सती के कहने पर वे फिर भी इस यज्ञ में आए। लेकिन अभिमान वश राजा दक्ष ने शिव को अपमानित किया जिससे दु:खी होकर शिव की पत्नि सती हवन कुण्ड में कूदकर भष्म हो गई इससे शिव क्रोधित हो गए और उनके क्रोध से उत्पन्न वीरभद्र नामक शिवांश ने राजा दक्ष का शीष काट दिया, जिससे बाद मेें भगवान आशुतोष अर्थात भगवान शिव ने दया कर बकरे का सिर लगाकर जीवित कर दिया। यह मंदिर राजा दक्ष की इस कहानी को बड़ी खूबसूरती से बयां करता नज़र आता है।
भीम गोड़ा
हर की पौड़ी से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित भीम गोड़ा घूमने के लिहाज से एक बेहतरीन जगह है। भीम गोड़ा के बारे में कहा जाता है कि जब पाण्डव हिमालय की यात्रा पर जा रहे थे तो वे यहां रूके थे। पानी न मिलने के कारण वे प्यास से बड़े परेशान थे अत: उस समय भीम ने जमीन में इतनी जोर से गोड़ा मारा कि जमीन से पानी निकल आया और पाण्डवों ने अपनी प्यास बुझाई। यह जगह आपको पाण्डव एवं महाभारत के विषय में और भी जानकारी देती है।

सप्तऋषि आश्रम

मनोहरी मूर्तियों को अपने अन्दर संजोए एक ऐसा स्थान जो यहां आने वालों को आत्मिक शान्ति प्रदान करता है वह सप्तऋषि आश्रम है। इस आश्रम के अन्दर सात ऋषिओं की मूर्तियां तपस्यां में लीन नज़र आती हैं। कहा जाता है कि जब ये सातों ऋषि जिनके नाम कश्यप, वशिष्ठ, अत्री, विश्वामित्र, जमदाग्नी, भारद्वाज और गौतम तपस्या कर रहे थे तो गंगा की धारा ने अपना स्थान बदल लिया जिससे इन ऋषियों की तपस्या में खलल न पड़े। यह आश्रम आगन्तुओं को आत्मचिन्तन के लिए पे्ररित करता है।

चीला बांध


चीला डेम एक पिकनिक स्पॉट है जहां आपको विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं के साथ प्राकृतिक की खूबसूरत छटा दिखलाई पड़ेगी। पानी में अट्खेलियां करते हाथीओं का झुण्ड जहां आपकी यात्रा की थकान को भुला देता है वहीं आपके मानस पटल पर एक शानदार दृश्य भी अंकित करता है। यहां पर बनी नयनाभिराम कृतिम झील आगन्तुओं को तरोताजा कर घन्टो बैठे रहने के लिए विवश करती हैं।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

मुर्दा कब्र से बाहर आया

हरिओम त्यागी
मुझे अपनी सांस रूकती सी नज़र आने लगी, गला घुटने से मेरी जीभ
बहार निकल आई,मुझे लगा कि अब मेरे प्राण पखेरू उडऩे ही वाले हैं

दिनांक -३१-१२-२००९, साल का अन्तिम दिन भी बीत गया था, रात का तीसरा पहर शुरू हो गया था। आसमान पर बादल मंडरा रहे थे बादलों की काली छाया जमीन पर प्रेत की मानिन्द इधर-उधर दौड़ती प्रतीत हो रही थी। रूक-रूक कर चल रहे हवा के झोंके पेड़-पौधें से टकराकर एक अजीब सा वातावरण बना रहे थे। नए वर्ष काजश्न दोस्तों के साथ मनाकर मैं पैदल ही नशे की हालत में सुनसान सड़क से घर लौट रहा था। सड़के एक ओर कब्रिस्तान था। कब्रिस्तान में अपने आप उग आए पेड़ व झाडियां से रह रहकर चल रही हवा के टकराने से सीटियां सी बज रही थी। दूर जंगलों से रह-रह कर आ रही गीदड़ों की आवाज़ एक भयानक वातावरण बना रही थी। सहसा कब्रिस्तान से एक साथ कई उल्लूओं के चीखने की आवज़ मेरे कानों में पड़ी, उनींदा सी मेरी निगाहें न चाहते हुए भी कब्रिस्तान की ओर उठ गई। कब्रिस्तान में चारोद्कि एक गहन सन्नाटा पसरा हुआ था। पेड़-पौधे, झाडिय़ां सब इस तरह से शान्त थे जैसे यहां किसी को मृत्यु दण्ड सुनाया गया हो। अभी मैं अपनी नज़र वहां से हटा भी नहीं पाया था कि ज़मीन पर बनी कब्र को फाड़कर एक मुर्दा उठ बैठा, आकाश में गडग़ड़हाट के साथ बिजली कौंधी जिसमें कब्र से निकले मुर्दे का जिस्म नहा गया, मेरा नशा ऐसे काफूर हो गया जैसे गधे के सिर से सींग, थोड़ी देर तक मैं जहां खड़ा था वहीं बुत की मानिन्द खड़ा क ब्र से निकले शरीर को देखता रहा। मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होरहा था, लेकिन अगले ही पल मैंने अपने उपर हावी हो रहे डर को दूर करते हुए अपनी गर्दन झटकी, मैं सोचने लगा शायद मुझे ज्यादा चढ़ गई है और फिर मैं कुछ इस तरह सोचता हुआ आगे बढ़ गया। अभी मैं कुछ कदम ही चला था कि भयानक आवाज़ों ने मेरे विचारों के चिथड़े उड़ा दिये,सैंकड़ों कुत्तों के रोने की आवज़ व चमगादड़ों के चिल्लाने की आवाज़ मेरे कानों को छीलने लगी न चाहते हुये भी मैं पीछे छोड़ आये कब्रिस्तान की और देखने लगा। कब्रिस्तान का दृश्य देखकर मेरे के तिरप्पन कांप गये। मुझको अपनी सांसें रूकती सी नज़र आने लगी। एक छ: फुटा हट्टï-कट्टï शरीर कब्र से निकलकर मेरी तरफ आ रहा था,लेकिन अभी भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि जो घटित हो रहा है वह हकीकत में घटित हो रहा है। मैंने अपने आप को बचाने के लिए पास ही खड़े पीपल के पेड़ के पीछे छिपा लिया। मेरा मस्तिष्क चक्रघ्रिन्नी बना हुआ था। आज तक मुझे ऐसे वाक्या से पाला नहीं पड़ा था। भूतप्रेत की कहानियां मैंने बचपन में सुनी ज़रूर थी लेकिन बचपन से लेकर अब तक मुझे ये कहानियां मात्र कहानी ही नज़र आती थी। मैंने इन्हें सच कभी नहीं माना था,लेकिन अब वे कहानियां रह-रह कर मेरे ज़हन में घूम रही थी। मैंने सुना था कि भूत के पैर पीछे की ओर होते हैं। सहसा मेरा ध्यान मुर्दे के पैरों की तरफ गया, पैरों पर नज़र पड़ते ही मेरे होश उड़ गए, उस आदमकद शरीर के पैर वास्तव में ही पीछे की तरफ थे,जैसे ही मुझे यह लगा कि मेरे सामने साक्षत भूत है जो सीधा कब्र से उठकर मेरी तरफ आ रहा है तो मेरी घिग्गी बन्ध गई, ३१ दिसंबर की सर्द रात में भी माथे से पसीना चूने लगा, मुझे अपनी टांगे कांपती सी लगी, मुर्दा लंबे-लंबे डग भरता मेरे बिलकुल नजदीक पहुंच गया,मेरा जिस्म भय के कारण मिर्गी के मरीज़ की मानिन्द कांप लगा और दिल पसलियों से धड़ा-धड़ टकराने लगा। मुर्दे ने एक दम मेरे पास पहुंचकर हवा में कलाबाजी खाई और पीपल के एक तने पर उल्टा लटक गया अर्थात उसने पैरों से तना जकड़ा और दोनों हाथ नीचे लटका दिये। मेरी जान में जान आई, मुझे लगा कि भूत ने मुझे देखा ही नहीं है। अभी मैं इस बात से निश्चित भी नहीं हुआ था कि एक पंजा ने मेरी गर्दन पकड़ ली। पंजे के सर्द स्पर्र्श मात्र से ही मेरी हवाई उडऩे लगी। मैं अपने दोनों हाथ से भूत के पंजे को गर्दन से अलग करने का प्र्रयास करने लगा। लेकिन ज्यों-ज्यों मैं पंजे को अलग करने के लिए ताकत लगाता उतना ही ज्यादा मेरी गर्दन पर पंजे का दबाव बढ़ता जाता। पंजे के दबाव से मेरा गला घुटने लगा,मुझे अपनी सांस रूकती सी नज़र आने लगी,गला घुटने से मेरी जीभ बहार निकल आई,मुझे लगा कि अब मेरे प्राण पखेरू उडऩे ही वाले हैं तो मैंने अपनी पूरी ताकत सिमेटकर अपने दोनों पैर पेड़ के तने पर दे मारे। तडाक! की आवज़ के साथ मेरे पैर बैड के फ्रेम से जा कर टकराय और दर्द से करहाते हुए मैंने आंखे खोल दी। मैंने तेजी से अपने कमरे का मुआइना किया मुझे जल्दी ही समझ में आ गया कि मैंने एक भयंकर सपना देखा है। लेकिन अगले ही पल मुझे याद आया कि सपने में जो जगह थी वह तो मेरे फ्लैट के सामने है। अत:मैं नाइटी पहने ही दरवाज़ा खोलकर बहार निकला। बाहर का दृश्य देखकर मेरी आंखें भय व विस्मय से फैल गई। पेड़ पर सपने की तरह एक लाश उल्टी लटक रही थी। मैंने उसके चेहरे पर नज़र डाली तो उसने सहसा आंखें खोल दी जो अब एक टक मुझे ही निहार रही थी। मुझे ये दोनों आंखें इतनी भयानक लगी कि मैंने डर कर धड़ाम से दरवाज़ बन्द कर लिया और तब खोला जब सब लोग जाग गए। मैंने जब अपनी रात की घटना वहां के लोगों से बताई तो उनमें बुजर्ग लोगों का कहना था कि जहां ये फ्लैट बने हुए हंै पहले यहां कब्रिस्तान हुआ करता था। इस घटना का मुझ पर इस कदर असर हुआ कि मैं अभी तकबिस्तर से नहीं उठ पा रहा हूं। बताया जाता है कि यह फ्लैट जहां बने हंै पहले वहां कब्रिस्तान हुआ करता था। वहां के एक पुराने बाशिन्द का कहना है कि यहां उसके कई दोस्तों ने उल्टी लटकी लाश देखी हैं। मनोचिकित्सक इन घटनाओं को मात्र मानवीय सोच की उपज बताते हैं उनका कहना है कि भूतप्रत का कोई अस्तित्व नहीं होता है,हो सकता है कि मैंने सपने में जो देखा हो उसका असर मेरे दिमाग में जागने के बाद भी रहा हो और मुझे लगा हो कि पेड़ पर कोई मुर्दा लटक रहा है, जो भी हो लेकिन रात यह घटना मेरे चित से नहीं उतर रही है।


बुधवार, 30 दिसंबर 2009

Makka al-Mukarrama: एक पाक शहर





हरिओम त्यागी

मुसलमानों का सबसे पाक शहर

मक्का वह पाक स्थान है जहां से इस्लाम का उद्भव होकर दुनिया में भर में फैला। शिरत पर्वत पर स्थित यह शहर पैगंबर मुहम्मद का जन्मस्थली है। मक्का का पूरा नाम मक्का अल-मुर्करम(Makka al-Mukarrama) है। बड़ी मात्रा में तेल मिलने के कारण यह शहर पुरानी शान-औ-शौकत के साथ अधुनिकता के माहोल में लिपटा हुए है। जहां यह पवित्र शहर होने के कारण इस्लाम मानने वालों का पसंदीदा शहर है वहीं अपनी खूबसूरती से संसार के सैलानियों को अपनी तरफ आकॢषत करता है। यहां के रंग-बिरंगे बाज़ार में महकती मसालों की खुशबू इस शहर की फिज़ा को एक अलग रंग प्रदान करती है। इस पवित्र शहर का विहृंगम दृश्य यहां आये पर्यटकों के हृदय को जीत लेता है। एक तरफ यहां मौजूद मस्जिद अल-हरम (Masjid al-Haram) की भव्य इमारत है मनुष्य के हृदय में शान्ति व प्रेम का अलख जगाती है तो दो हजार साल पूरानी काबा की इमारत जादू सा असार छोड़ती है। जैसा कि हम जानते हैं कि हर मुसलमान के लिए हज्ज करना उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश होती है। एक अनुमान के अनुसार तीन मिलियन से ज्यादा मुसलमान प्रति वर्ष हज़ करने मक्का आते हैं। इस्लामी परंपरा के अनुसार मक्का की स्थापना इश्माइल वंश द्वारा मानी जाती है। इस्लाम के उत्थान व प्रभाव के इतिहास का यह शहर मुक गवाह है।वर्तमान समय में मक्का अपनी पारंपारिक व मॉडर्न जीवन शैली को एक साथ संजाये हुए है।आधुनिक मक्का शहर सऊदी अरब के मक्कहा प्रांत (Makkah Province) की राजधानी है। यह एतिहासिक हजाज़ क्षेत्र में स्थित है। जेद्दा से 73 किलोमिटर की दूरी पर स्थित मक्का की जनसंख्या लगभग 17 लाख के आस-पास है।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

दिल्ली भी बन सकती है पेरिस

भारत देश समस्याओं का पिटारा है, लेकिन साधनों का टोकरा भी है। पहले वाक्य कि भारत समस्याओं का पिटारा है का बखान गाहे-बगाहे हमारे नेता और ब्यूरोक्रेट्स करते रहते हैं। वहीं दूसरी बात कि हमारे देश में साधन की भी कमी नहीं के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि भारत साधन सम्पन्न देश नहीं होता तो आज विश्व की जनंसख्या का छटा हिस्सा भारत में नहीं निवास करता अर्थात विश्व की जनसंख्या लगभग 6 अरब है और उसमें से एक अरब से ज्यादा लोग भारत में रहते हैं और इसकी वजह है भारत की साधन सम्पन्नता। भारत की सम्पन्नता को ही देखकर पूर्व में दूरस्थ देशों के शासकों ने यहां पर आक्रमण कर भारत पर अधिकार किया और यहां के साधनों का दोहन कर अपने देशों को सम्पन्न किया है। आज भारत अपने साधनों का सही प्रकार से दोहन न कर पाने के कारण विकास की दौड़ में काफी पीछे रह गया है। छोटा सा देश जापान हो या हमारे से ज्यादा संख्या वाला चीन, रेगिस्तान में बसा यूएई हो या फिर विश्वयुद्घ में टूट चुका जर्मन हो सब भारत को ठेंगा दिखाकर आगे निकल चुके हैं।


आजकल एक नया संवाद काफी प्रयोग किया जा रहा है कि ''इंसान दूसरे के काम में नुक्स तो निकाल देते हैं लेकिन उसका समाधान नहीं बताते हैंÓÓ। जबकि मामला इससे इतर है, भारत में लोगों की आदत सलाह देने की है, न कि खामिया निकालने की। कमियां निकालने की आदते बाहरी देशों में ज्यादा हंै और उनकी सफलता के पिछे उनकी यही आदत मंत्र की तरह कार्य करती है। वर्तमान में तो हमारे समाचार पत्र भी आलोचनात्मक लेख व संपादकीय में व्यक्ति विशेष पर ही आक्षेप लगाते प्रतीत होते हैं न कि सिस्टम पर चोट करते। आज जो परिवेश है वह एक इंसान के बदलने से नहीं बदलेगा इसके लिए हमे सिस्टम में परिवर्तन की दरकार है। हमें पुरानी सोच एवं धारणाओं का दरकिनार कर के नए तरीके इज़ाद करने होंगे। हमारे जंग खाए सिस्टम की गड़बड़ी के कारण हमारे मेट्रो शहर बर्बादी की तरफ बढ़ रहे हैं। देश की राजधानी जो देश का सबसे महत्वपूर्ण शहर है कि ही बात करें तो हमें नहीं मालूम कि आने वाले पचास साल बाद दिल्ली की हालत क्या होगी? जाम से जूझती सड़के, पानी के लिए के लिए होता खूनखराबा, बिजली के लिए सड़को पर नारेबाज़ी करती जनता, बसों से कुचले जाते इंसान, देश की राजधानी दिल्ली की जिंदगी का एक हिस्सा बन चुके हैं। ये समस्याएं कुछ महीनों या सालों से नहीं है अपितु दशकों से चली आ रही हैं। अगले साल कॉमनवेल्थ गेम होने हैं गेम्स होंगे, नौ दिन के लिए कुछ रास्ते बदल दिए जाएंगें जहां-जहां से विदेशी गुजरेंगे उन रास्तों को रंगरोगन करके चमकाया जा रहा है और दिल्ली के एक छोट से हिस्से का ठोक-पीट कर सही किया जा रहा है। खेल के नौ दिन बाद फिर रास्ते पहले की तरह होंगे। दिल्लीवासियों की जिंदगी फिर अपने पुराने ढर्ऱे पर लौट आयेगी। कॉमनवैल्थ गेम्स के कारण दिल्ली का विकास एवं खूबसूरत होने की आस लगाए बैठ लोगों को नौ दिन के इन खेलों के बाद यमुना के किनारे बने कुछ बहुमंजिले टॉवर्स एवं खेल परिसरों को ही देखकर संतोष करना पड़ेगा। 'समय पर जैसा मिल जाए उसी से काम चलानेÓ की हमारी आदत एक दिन हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। आज दिल्ली अवैध कॉलोनियों का गढ़ बन कर रह गई। इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पूरा एनसीआर अवैध निर्माण की भेंट चढ़ रहा है। भला हो नोएडा और हुडा का जिन्होंने नोएडा एवं गुडगांव बसा कर लोगों को दिल्ली से बाहर निकलने का रास्ता तो छोड़ दिया। यदि गाजियाबाद और फरीदाबाद की बात करें तो वहां इतनी चौड़ी सड़के या जगह ही नहीं बची है कि आने वाले 50 साल में आने-जाने वाले वाहनों का बोझ उठा सकेंगी। वर्तमान में ही यदि इन शहरों को दिल्ली से जोडऩे वाले मार्ग पर कोई दुर्घटना हो जाए या वाहन खराब हो जाए तो लंबा जाम लग जाता है, और यह सब हमारे नकारा सिस्टम की ही करतूत का एक हिस्सा है। जिस तरह से दिल्ली व उसके आस-पास के स्थान विकसित हो रहे हैं उससे नहीं लगता कि 50 साल बाद दिल्ली और एनसीआर भद्र लोगों के रहने लायक बचेगा। पूरा का पूरा क्षेत्र अवैध निर्माण के कारण अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ जाएगा। इसका भी हाल चांदनी चौक की तरह हो जाएग। चांदनी चौक जो कभी दिल्ली का सबसे खास रिहायसी इलाका होता था, आज वहां शायद ही कोई भद्र इंसान रहना पसंद करे। चांदी चौक बस एक मार्केट बन कर रह गया है और तमाम पुरानी हवेलियां व घर जहां कभी देश के शक्तिशाली लोग सुकून से रहा करते थे, वे अब सूने पड़े हैं। इसका कारण अवैध मार्केट और निर्माण, उचित रास्तों का आभाव और सरकार की उपेक्षा मुख्य कारण है। सरकार में बैठे अधिकारियों का कहना है कि अवैध निर्माण एवं कॉलोनियों को नियामित करने के अलावा हमारे पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है। लेकिन यदि सरकार दिल्ली में अवैध कॉलोनियों में रह रहे लोगों के लिए पुर्नवास अर्थात रहने के लिए बेहतर व्यवस्था करेतो और उनको उनकी जमीन या प्लॉट के अनुसार प्लॉट या फ्लैट दिया जाएं तो वे लोग हंसते-हंसते अवैध कॉलोनी खाली कर देंगे। अब बात रही उनको विकसित करके भूखण्ड या फ्लैट देने में आने वाले खर्च की भरपाई करने की तो उनके द्वारा खाली की गई जमीन को डेवलप करके, उससे बेचकर यह भरपायी पूरी की जा सकती है। अवैध कॉलोनियां शहर के बीचों-बीच हैं। अत: वहां की जमीनकी कीमत काफी ज्यादा होगी। नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद एवं गुडगांव में सरकार किसानों को 1 हजार से 2 हजार प्रति मीटर तक का मुआवजा बांट रही है। इस जमीन को यदि विकसित किया जाए तो इसकी कीमत 5 से 6 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होगी। इस तरह अवैध कॉलानियों की जमीन से यह जमीन और मकान कहीं सस्ते होंगे। इसको इस तरह समझ सकते है कि दिल्ली में अक्षर धाम मंदिर के सामने कई अवैध कॉलोनियां है। तंग गलियों में जैसे-तैसे लोग जीवन व्यतीत कर रहे हैं लेकिन यदि सरकार उनको वहां से कुछ दूर जमीन खरीदकर शानदार कॉलोनी विकसित करके देती तो वहां के लोग खुशी-खुशी जगह खाली कर नई जगह शिफ्ट हो जाएंगे। नोएडा ऑथोरिटी इस फॉर्मूले पर काम कर चुकी है। सेक्टर 14 से मेट्रो ट्रेक के आड़े कई भवन आ रहे थे। सेक्टर 14 नोएडा के सबसे पुराने सेक्टरों में से एक है। अत: नोएडा ऑथोरिटी ने भवन स्वामियों को नवसृॢजत सेक्टर 44 में उन लोगों को भूखण्ड ऑफर किये और उन सब भवन स्वामियों ने खुशी-खुशी ऑथेारिटी का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जिसकी मुख्य वजह सेक्टर-44 नया होने क कारण सेक्टर-14 से बेहतर ढ़ंग से विकसित हो रहा था। यही फार्मूला चीन के बिजिंग शहर में ऑलंपिक गेम्स के दौरन अपनाया गया। इस तरह से दिल्ली को भविष्य के लिये तैयार करने के लिए नई कार्ययोजना बनाकर इसे पेरिस या लंदन की तरह स्वरूप दिया जा सकता है। पेरिस भी दिल्ली की तरह साइन नदी के किनारे बसा है। यमुना कि तरह साइन नदी भी कभी मृतप्राय को चुकी थी। लेकिन वहां की सरकार ने उसकी सफार्ई कराकर, उसके अन्दर साफ पानी प्रवाहित कराया। वर्तमान में साइन नदी में शहर का गंदा पानी ट्रीट करके ही डाला जाता है। खूबसूरत पेरिस को यह नदी पेरिस को ओर खूबसूरत बना देती है। यदि सरकार प्रयास करे तो दिल्ली को भी लंदन या पेरिस की तरह खूबसूरत बनाया जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव हो सकता है जब इरादों में दुगनी ताकत हो। सरकार और अधिकारियों में दृढ़ इच्छा शक्ति हो।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कलिंग जिसने सम्राट अशोक हृदय बदल दिया

हरिओम त्यागी


कलिंग जिसने सम्राट अशोक हृदय बदल दिया


उड़ीसा भारत के पूर्वी तट पर स्थित झारखण्ड पश्चिमी बंगाल व आंध-प्रदेश से घिरा है। भगौलिक रूप से इसके उत्तर में छोटा नागपुर का पठार है जो कम उपजाऊ है। इसके दक्षिण में महानदी, ब्रम्हाणी, वैतरणी व कालिंदी नदियां अपनी जल धारा से इसको हरा-भरा किये हुए है। यह क्षेत्र विशेषत: चावल की फसल के लिए विश्व विख्यात है। पूर्वी तटों पर बसे राज्यों में उड़ीसा सबसे निर्धन राज्य है। यहां की आधे से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करती है। उड़ीसा की राजधानी भुनेश्वर है जो इसकी पहली राजधानी कटक से मात्र 25 किमी दूर है अब ये दोनों शहर मिलकर एक युगम शहर बनाते हैं। भारत के चार धामों में से एक धाम उड़ीसा के शहर पुरी में विद्यमान है जो भुनेश्वर से 60 किमी की दूरी पर है। उड़ीसा का सबसे ऊंचा पर्वत देवमाली है। यहां के बीच व संस्कृति पर्याटकों को सहसा अकर्षित करते हैं। यहां के मुख्य आर्कषण में कॉनार्क स्थित सूर्या मंदिर, पुरा में जगन्नाथ मंदिर , दुनिया का सबसे लंबा बांध हीरा कुण्ड बांध भी यहीं है। लेकिन इस सब के साथ ही यह प्रदेश प्राकृतिक अपादाओं का शिकार होता रह है। यहां 1999 में आऐ भयंकर साईकलॉन में दस हजार से ज्यादा जीवन लीलाएं समाप्त हो गई थी।

इतिहास के पन्नो से

उड़ीसा प्राचीन में कलिंग के नाम से जाना जाता था। कलिंग इतिहास में एक ऐसा नाम है जिसने युद्घ का विभत्स रूप देखा है। उस समय के महान प्रतापी सम्राट अशेक का अहम इसपर कहर बन कर टूटा। कलिंग का युद्घ जिसे देख कर मृत्यु स्वयं सकपका उठी होगी। चारों ओर धरा पर बिखरे पड़े नर मुंड। धड़, भुजा व गर्दन के ढऱ में अपनों को तालाशती ममतामयी आंखें। लाशों के ढ़ेर में बिलखता दुधमुहा बच्चा। घोड़ों व हाथियों के पैरों तले कुचलते नौनिहाल। हा! किसी पाषाण हृदय वाले मानव से भी यह मृत्यु का रौउद्र रूप नहीं देखा गया होगा। अच्छे-अच्छे काठोर दिल वालों के हृदय से हूक निकल गई होगी। स्वयं सम्राट अशोक ने जब यह सब देख तो उनसे यह सब देखा नहीं गया और खून से सनी तलवार उनके हाथों से छूट कर जमीन पर जा गिरी। इसके बाद सम्राट ने कभी भी तलवार नहीं उठाई। कलिंग युद्घ का असर सम्राट अशोक पर इस कदर पड़ा की उन्होंने हिंसा हमेशा के लिए छोड़ कर अहिंसा का रास्ता चुन लिया। इसके बाद कलिंग ने हजारो वर्ष जिये कभी युद्घ की विभीषिका, कभी गरीबी की दास्तां तो कभी प्राकृतिक आपदा कलिंग का नसीब रही हैं। इसको ही वर्तमान में उड़ीसा कहा जाता है। लेकिन इस सब के बावजूद यह राज्य वक्त से लड़ते हुए अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहा है। आज यहां बना विश्व का सबसे लंबा बांध है तो वहीं हिन्दू के चार धामों में से एक इसके शहर पुरी में है। इसके अलवा यहीं पर अपनी वस्तुकला से चकित कर देने वाला सूर्या मंदिर सीना ताने गर्व से खड़ा है। यहां के सी-पोर्ट आगन्तुओं को जहांं जमकर लूभातेे हैं वहीं यहां के स्मारक अपनी निर्माण शैली से इतिहास में अपनी जगह बनाए हुए हैं।

श्री जगन्नाथ मंदिर

रामेश्वरम, बद्रीनाथ, द्वारका व पुरी, ये हिन्दूओं के चार धाम है जहां पर जाने से हिन्दू मान्यता के अनुसार जन्म मरन से मुक्ती मिल जाती है। पुरी में दो शक्तियों का प्रदुभर्व है एक भगवान द्वारा व दूसरी इंसान द्वारा सुसज्जित है। एक तरफ यहां पर धार्मिकस्थानों व मंदिरों में भ्रमण कर के पुण्य कमाया जा सकता है वहीं आप यहां के बीच व बाजारों का लुत्फ उठा सकते हैं। पुरी को जगन्नाथ पुरी के नाम से भी पुकारा जाता है। यहां का श्री जगन्नाथ भगवान का मंदिर एक शानदार स्मारकों में से एक है। 65 फीट ऊंचा पुरी का मंदिर 12 वीं शताब्दी मेें चोड़ागंगा शासक ने बनवाया था। नील गिरी पर्वत पर बना यह विशाल मंदिर चारो ओर से 12 मीटर ऊंची दीवार से घिरा हुआ है। सुबाह-सुबाह यहां समुद्र पुरी धाम के पैर धोता प्रतीत होता है। पर्याटको के लिए यह शानदार अनुभव हो सकता है। बीच पर सन बाथिंग करने का एक अपना ही आनन्द है। यहां आप तैराकी का आनान्द भी उठा सकते हैं। लेकिन यहां पर भाव तेज होता है इस लिए अच्छे तैराक ही यहां पर तैर सकते हैं।

कोणार्क का सूर्या मंदिर

कोणार्क में घूमने का अपना एक अलग आनन्द है। यहां पर जहां आपको अपने चारो तरफ आधुनिकता से परिपूर्ण वातावरणा दिखाई पड़ता है वहीं कोणार्क में छेनी की धार व हाथों के कौशल भी दिखलाई पड़ता है। 13 वीं शताब्दी में तराशा गया कोणार्क में सूर्या मंदिर की वस्तुकला अपने आप में एक आश्चर्य है। इसकी बेजोड़ शिल्प कला यहां आने वालों को अभिभूत किये बिना रहती है। कोणार्क समुद्र तट पर स्थित एक शहर है जहां पर आगन्तु धमिर्क स्थानों के दर्शन करने के साथ यहां के वेहतरीन बीच और हरी भरी प्राकृतिक का आनन्द ले सकता है। दूर तक फैली हरियाली , खिले हुए पुष्प, शान्त वातावरण , पक्षियों का चहचहाना, मानों एक अलग दुनिया हो जहां प्राकृतिक के साथ एकीकार होने का अवसर मनुष्य को मिलता है। यहां स्थित झील में विभिन्न दुर्लभ प्रजातियों के पक्षी, निवास करत हैं। दिसंबर से जनवरी के मध्य यहां पर प्रवासी पक्षियों का निवास भी होता है जिनको देखने का अलग ही अनुभव है।

सूर्या मंदिर एक चार फीट ऊंचे प्लेटफार्म पर बना है। कहा जाता है कि इसको 1200 कारीगिरों ने16 वर्षों में तैयार किया था। यह 24 पहियों का एक रथ है जिसको सात घोड़े खींच रहे हैं। इसके 12 जौड़ी पहियें 12 महिनों के प्रतिक हैं जबकि साथ घोड़े सात दिन के प्रतिक है। यह सूर्या मंदिर विश्व के शानदार स्मारकों में से एक माना जाता है। इस पर की गई नक्काशी व उकेरी गई कविता अपने आप में दशर्नीय हैं। मंदिर के अन्दर तीन सिरों वाली सूर्य देव की मूर्ति बेजोड़ है। इस के साथ ही सूर्या की पत्नी माया का मंदिर भी है। इतना ही नहीं मंदिर परिसर में नौ ग्रहों के मंदिर भी है जिनमें चंद्रमा, मंगल, शनि, बुद्घ, शुक्र,बृहस्पति, राहू व केतु हैं। यहां सूर्या देवता को विभिन्न रूपों में मूर्तियों के द्वारा दिखाया गया है। मूर्तियों के भाव देख कर यहां आने वाले अनायास ही दांतो तले ऊंगलियां दबाये बिना नहीं रहते हैं।

हीराकुंड बांध

हीराकुंड बांध दुनिया का सबसे बड़ा बांध है। यह महानदी पर बना उत्तर में शांभालपुर से 15 किमीटर की दूरी पर बनाया गया है। यह महानदी के उपर बना एक सुयंक्त संरचना वाला बांध है। इसका उद्देश्य उड़ीसा के जिलों में सिंचाई की व्यवस्था करना व बरसात में बाढ़ पर काबू पाना है। दुनिया के इस सबसे लंबे बांध की लंबाई 4.8 किलोमिटर है। इस बांध की लंबाई आवश्यकता के अनुसार 25 किमी तक बढ़ाई जा सकती है। इस बांध में 5818 क्यूसैक मीटर पानी स्टोर करने की क्षमता है। 743 स्कवायर किमी क्षैत्र को खोद कर पानी एकत्रित किया गया है। इसको एक कृतिम झील का रूप दिया गया है। यह एशिया की अब तक की सबसे बड़ी कृतिम लेक है। इसके किनारे पर 21 किलोमिटर की सड़क है। जरा कल्पना करो एक तरफ विशाल जलराशि तो दूसरी तरफ फूलों पैड़-पौधें से हरा-भारा प्राकृतिक सौन्द्रीय बरबस ही आगनतुओं के मन को प्रफुलित कर देता है। यहां आप सूरज ढले एक लोंग ड्राइव पर जा सकते हैं। यहां का दृश्य अपनी खूबसूरती से पर्यटकों को मंत्र-मुग्ध कर देते हंै। लगता है जैसे हम एक स्वपनील दुनिया में आ गये हों। बांध के उपर घूमती मीनार और इसके चारों ओर अथहा जल एक ऐसा चित्र उपस्थित करता है कि मुख से स्वत: ही वाह! निकल पड़ता है। इस मीनार को गांधी मीनर कहा जाता है। जहां यह बांध बनाया गया वहां पहले सुखाग्रस्त क्षेत्र हुआ करता था और इससे नीचे का क्षेत्र बाढ़ पीडि़त था। लेकिन बांध बन जाने से जहां पानी को आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाने लगा है वहीं यहां बड़ी मात्रा में बिजल का उत्पादन भी किया जा रहा है।

लिंगराज मंदिर

लिंगराज मंदिर उड़ीसा के प्रसिद्घ मंदिरों में से एक है। यह भगवान शिव का मंदिर है। शिव भगवान को लिंगराज कहा गया है। इस मंदिर को शानदार नक्काशी से सजाया गया है। यह 54.8 मीटर ऊंचा मंदिर है जिसमें भगवान शिव की शानदार प्रतिमा स्थपित है जो ग्रेनाइट की बनी हुई है। इस मंदिर में आकर ऐसा प्रति होता है जैस हमार प्राचीन काल हमारे सामने आ कर खड़ा हो गया हो। यह 11 वी शताब्दी में बना हुअी इमारत है। भूनेश्वर उड़ीसा की राजधानी है। यह मंदिरो का शहर माना जाता है। लिंगराज यहां का सबसे विशाल मंदिर है यह चार हिस्सों में बना हुआ है। इसके प्रवेश द्वारा को सिंह द्वार कहा जाता है। इसके अन्दर लगभग 150 मंदिर है। इसमें यजमानशाला, भोगमंडप, और नाटयशाला हैं। इसके मुख्य द्वार के एक तरफ भगवान शिव का त्रिश्ल है तो दूसरी तरफ भगवान विष्णु का चक्र है।

बीच

उड़ीसा के बीचों का साफ पानी और खूबसूरती आपको एक ऐसी कल्पनाओं की दुनिया में ले जाती है जहां आपका मन उन्मादित होकर एक नई उड़ान भारने लगता है। बीच के चारों ओर का वातावरण आपको स्वर्ग जैसे माहोल का एहसास करता है। गोपालपुर ऑन सी बीच यहां के सबसे प्रसिद्घ बीचस में से एक है। यह बंगाल की खाड़ी से लगा हुआ है। इसके अलवा पुरी बीच भी लोगों को अपनी तरफ काफी आकर्षित करता है। जहां के नीले वाटर में मौज-मस्ती करने के साथ यहां की ढंडी बयार का आनन्द भी लिया जा सकता है। इसके अलावा हजारों की संख्या में हर वर्ष श्रद्घालू चान्दीपुर के बीच पर पवित्र डुबकी लगा कर अपने पापों से मुक्ती प्राप्त करते हैं। इसके अलावा यहां के अन्य बीचस में में आर्यापाली बीच , बलरामगढ़ी बीच, अस्तरंगबीच, बालीघाई बीच, बालीहरचंदी बीच, जालासारी बीच व पाटीसोनापुर बीच प्रमुख हंै जहां पर पर्याटक जाकर अपना स्वर्णीम समय व्यतीत कर सकते हैं।




सोमवार, 14 दिसंबर 2009

किसके हिस्से में कितना चांद

हरिओम त्यागी

 किसके हिस्से में कितना चांद

दुनिया हैं बेसक मंदी के दौर से गुजर रही हो पर आज भी प्रॉपर्टी के दीवानों नई डेस्टीनेशन पाने के लिए लालयित. कुछ हैं अलग हट कर करने वाले लोग पृथ्वी को छोड़ अब स्पेस में भी प्रॉपर्टी की खोज में दिन रात एक करे हुए. इन लोगों की मुराद पूरी करने के लिए भारत, चीन, जापन अपने यानों के द्वारा चांद पर चक्कर काट रहे हैं. जिसने हंै चांद के बटवारे को लेकर सरगर्मीयां तेज कर दी. इस हो बात पर विभिन्न देश माथापच्ची करने लगे हैं कि किस के हिस्से में कितना चांद? जानकार हैं इस विषय में कानून बनाने के हक में. लेकिन है कानून बनाने के लिए किसको आधार माना जाए यह एक पेचिदा विषय. हैं देश चांद पर मौजूद खनिज को हथियानें के लिए अपनी विकसित - अपनी योजनाओं पर काम कर रहे. इतना हैं ही नहीं विशेषज्ञों की टीम चांद पर प्रॉपर्टी के बटवारे का खाका तैयार करने में लगी गई.

चांद पर प्रॉपर्टी के लिए जंग

जमीन - जायदा हमेशा से युद्घ का कारण बनती रही है. पूरातन हैं में राजा महाराजा अपनी सीमाएं बढ़ाने के लिए जंग करते रहे. पुरातन समय ही क्यों वर्तमान समय में भारत - पकिसतान, चीन - भारत, इजराइल - फीलिपस्तीन सहित दुनिया के तमाम देश जमीन के टुकडें के लिए जंग कर चुके हैं और अक्सर जंग जैसी स्थिति से दो - हैं चार होते रहते. यदि होगी यह कहा जाए कि आने वाला महायुद्घ चांद के बटवारे के लिए हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं. प्रॉपर्टी हैं के लिए दुनिया भर के देशों में होड़ मची हुई. हैं भारत, जापन चीन, रूस, अमेरिका सहित कई देश चांद पर कब्जा जमाने के लिए चक्कर काट रहे. जल्दी जाएंगे ही नासा के लूनर और रिकोनिसस ओर्बिटर में स्थिापित हो. प्रॉपर्टी है की इस दौड़ को गूगल ने ओर रफ्तार दे दी. गूगल की ताजा घोषण के अनुसार चंद्रमा पर रोबेट भेजने व वहां पर 500 मीटर तक की चहल - कदमी करने वाली टीम को गूगल तीन करोड डॉलर देगी. इसके बदले वह चंद्रमा के विडियों, तस्वीरे और आंकडे चाहती है.

रियल एस्टेट की नई जमीन


चांद किसके हिस्से में कितना आएगा, यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन वह दिन दूर नहीं जब चांद रियल एस्टेट के बाजार में सबसे उम्दा लोकेशन में शुम्मार हो जाएगा. आने होगा वाले समय को देखते हुए लोग यह कयास लगाने लगे हैं कि आने वाले समय में चांद पर किस देश का कितना हिस्सा. जानकारों चाहिए का सुझाव है कि यदि विवाद से बचना है तो इस बारे में कानून बनाया जान. लेकिन हैं कानून उसी आधार पर बनाया जाता है जो पहले कभी हो चुका होता है अर्थात पुराने कानूनों को आधार मान कर ही कानून बनाए जाते. लेकिन है चांद का मामला एक दम अलग. यह है एक नई तरह की स्थिति. अत: विशेषज्ञों का मानना है कि चांद के लिए कानून कुछ समुद्री सीमाओं की तरह ही हो सकता है. जिसके हो हिस्से में जितना चांद आए उसको उसी हिसाब से उसका दोहन करने की छूट. वहीं है कुछ जानकारों का कहना ह ैकि इस तरह कि संसाधन पूरी मानव जाति की विरासत होती. इस चाहिए पर किसी देश व व्यक्ति विशेष का अधिकार नहीं होना.

साझा विरासत है चांद

इस हैं सबसे अलग कुछ कानून विद मानते है कि अंतरिक्ष में प्रॉपर्टी राईटस साझा विरासत के सिद्घान्त से अलग मानते. उनका हैं मानना है कि स्पेस में प्रॉपर्टी के लिए सामान्य नियम लागू नहीं किये जा सकते. वर्जिलियू है पॉप जो रोमानिया की स्पेस एजेंसी में रिसर्च विशेषज्ञ. वह हैं कई वर्षों से अंतरिक्ष में प्रॉपर्टी राइट्स के बारे में अध्ययन कर रहे. . श्री पॉप एक ऐसे कानून की पेरवी करते हैं, जिससे अंतरिक्ष में भी विभिन्न देशों की हिस्सेदारी मिल सके. समानता के सामान्य विचार से अलग पॉप मानते हैं कि चांद की संद्घि कॉमन हेरिटेज के आधार पर नहीं हो सकती क्योंकिे चीन, भारत और ब्राजील जैसे विकासशील देशों ने भी स्पेस में जगह बना ली है.

अधिकार आवश्यक प्रॉपर्टी का


जैस - जैसे स्पेस में निजीकरण का ट्रेंड बढ़ा रहा है उसे आउटर अंतरिक्ष में प्रॉपर्टी अधिकार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है. इस हो विषय में प्रॉपर्टी जानकारों का मानाना है कि चांद का बंटवारा इस तरह हो कि जो सम्पूर्ण मानव की भलाई के लिए. हैं विषय में श्री पॉप का मानना है कि जिस तरह 19 वीं इस शताब्दी में अमेरिका की जमीन का बंटवारा हुआ, उस बंटवारे को आधार मान कर चांद के भी हिस्से किये ता सकते. श्री है पॉप कहते है कि पूरा आसमान खुला पड़ा. दूनिया है भर के देशों के पास खोने के लिए कुछ नहीं. अत: सब देश आपस में एकजुट होकर चांद पर प्रॉपर्टी राइट्स तय करें.

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

फाइलों में बनते बिकते प्रोजेक्टस

फाइलों में बनते बिकते प्रोजेक्टस


आम आदमी के घर पाने का सपना कांच की तरह टूट कर बिखर रहा है। कभी उसने अपनी जि़न्दगी भर की पूंजी लगा कर एक अदद छत पाने का सपना आंखों में संजोया था जो आज उसकी आंख में कांच की किंकरी बनकर आंसू बहाने पर मजबूर कर रहा है। उसे शायद इस बात का इल्म नहीं था कि जिस परियोजना में वह घर खरीद रहा है वह फाइलों तक सिमट कर रह जाएगी। अब जब हकीकत से रू-ब-रू हुआ तो वह स्वयं को असहाय व ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है। इतना ही नहीं इन फाइलों में बनते बिकते प्रोजेक्टस में निवेशकों की भी बड़ी भारी मात्रा में पूंजी फंसी हुई है। निवेशकों एवं उपभोक्ताओं को ठगने का काम एक दिन में नहीं हुआ यह खेल वर्षों तक खला गया। इस खेल की जिम्मेदारी जिन सरकारी नुमाइन्दों पर थी वे जहां आंख मूंद कर सोते रहे वहीं इन पर नज़र रखने वाले विकास प्राधिकरण एवं अन्य एजेंसियों ने भी अपना हिस्सा लेकर, इन्हें सब्जबाग दिखाकर, कागजों में 'सपनों का घर बेचने की खुली छूट दी। फाइलों में बनते-बिकते प्रोजेक्ट्स के इस मकडज़ाल में पूरे देश का रियल एस्टेट फंसा हुआ है। प्रॉपर्टी एक्सपर्ट की टीम की जांच पड़ताल में जो सबसे चौंकाने वाला सच सामने आया वह यह कि आज देश का हर तीसरा बिल्डर्स कहीं न कहीं, कभी न कभी केवल फाइलों में प्रोजेक्टस बनाकर बेच रहा है या बेच चुका है। हरिओम त्यागी, यह विश्लेषणात्मक रिपोर्ट, रियल एस्टेट का एक ऐसी सच्चाई है जो इस इण्डस्ट्री सहित निवेशकों एवं उपभोक्ताओं के गले की फांस बन चुकी है।
  फाइलों में घर दिखाकर सपने बेचने वालों में केवल नये एवं छोटे डेवलपर्स ही नहीं हैं अपितु ऐसी नामचीन कंपनियां भी हैं जो रियल एस्टेट सहित अन्य क्षेत्र में भी अपना रुतबा रखती हैं। देश के हर एक हिस्स में इस तरह का खेल खेला गया। फाइलों में बेचे गए प्रोजेक्टस का खेल पूणे, मुम्बई, कोलकाता, चैन्नई, हैदराबाद, भोपाल, बंगलूर समस्त दक्षिण भारत के बड़े शहरों के आस-पास बाखूबी खेला गया, वहीं यदि उत्तर-पश्चिमी भारत की बात करें तो यहां की स्थिति इससे भी ज्यादा भयावह है। सबसे ज्यादा दिल्ली के आसपास इस तरह का खेल चला। इनमें गाजियाबाद में एन.एच.-५८ व एन.एच.-24 के क्षेत्र में शानदार टॉउनशिप में घर एवं भूखण्ड देने का सपना दिखाकर ग्राहकों एवं निवेशकों से जमकर धन एकत्रित किया।


यदि बात फरीदाबाद की करें तो यहां पर नहर पार क्षेत्र में तमाम डेवलपर्स व विकासकर्ता कंपनियां ने ग्राहकों से बड़े-बड़े वादे के महल खड़े किए जो मामूली सी मंदी के झटके में भरभरा कर ढह गए। हरियाणा के ही सोना रोड, सोनीपत के साथ दिल्ली-चण्डीगढ़ हाईवे के आस-पास सपनों के घर बनाए गए जिनका हकीकत में बनना आज भी संदेह के घेरे में है। इतना ही नहीं पंजाब में जालंधर, पटियाला, लुधयाना जैसे शहर भी इससे अछूते नहीं रहे। यदि उत्तर भारत की बात करें तो देहरादून, हरिद्वार, रुद्रपुर सहित तमाम पहाड़ी क्षेत्रों में कागजी प्रोजेक्टस आए औैर बिक गए। अब निवेशक एवं उपभोक्ता कराहा रहा है। सालों गुजर जाने के बाद भी जब तथा-कथित बिल्डर्स निवेशकों एवं अपभेक्ताओं को अपने प्रोजेक्ट्स के विषय में उचित जवाब नहीं दे पा रहा है तो उपभोक्ताओं औश्र निवेशकों ने कोर्ट एवं थानों में बिल्डर्स के खिलाफ मामले दर्ज करने शुरू कर दिए हैं। प्रभावशाली विकासकर्ता कंपनियां तो ले-देकर मामलों को जैसे-तैसे संभाले हुए हैं लेकिन छोटे या आथिर्क रूप से कमजोर डवलपर्स की उल्टी गिनती शुरू हो गई। कुछ तो दिवालिया हो गए या मामला दर्ज होने पर जेल की हवा खाने पर मजबूर हैं। ग्रीन सिटी, सेवन हेवन, एनआर बिल्डकॉन, जय किसन एस्टेट, एमटेक, नितिश्री, त्रिवेणी सहित इन बिल्डरों की एक लंबी सूची है जिनके खिलाफ धोखाधड़ी के मामले दर्र्ज हो चुके हैं। इनके संचालक या तो अंडर ग्राउंड हैं या जेल में बंद हैंं। यह तो स्थिति की शुरू आत है। आने वाले समय में इस तरह के डवलपर्स की सूची तेजी से लंबी हो रही है।

अब तक तो डेवलपर्स यह कहकर उपभोक्ता को बहकाता रहा कि रिसेशन है, मंदी है, लेकिन अब, जब बाज़ार चलने लगा है तो उसके पास अब कोई जवाब नहीं बचा है?। सही या उचित जवाब न मिलने पर उपभोक्ता व निवेशक कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहा है और मंदी से पहले फाइलों में घर बेचने वालों को जेल जाना पड़ा रहा है । इस मामले में न्यायलय भी सक्त दिखाइ पड़ रहा है।

यदि इस खेल को बारीकी से विश्लेषण करें तो इसमें बिल्डर्स का सारा दोष नहीं है। कहीं कहीं हमारी सरकारी व्यवस्था भी इसके जिम्मेदार है। उसका दोष यह था कि उसने अति उत्साह दिखाया, प्रॉपर्टी बूम को लाभ उठाने के लिए काफी संख्या में प्रोजेक्ट्ïस की प्लानिंग कर डाली। यह प्लानिंग उसने अपनी हैसियत से कहीं ज्यादा की। उसने यह प्लानिंग ग्राहकों से आने वाले पैसे के अनुसार की ओर उसके इसी अति उत्साहितपन ने आज उसेे बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया है। सरकार भी इसके बराबर की दोषी है, क्योंकि सरकार ने डेवलपर्स को खुला खेल खलने दिया। उस पर लगाम लगाने के लिए कोई नियम कानून नहीं बनाए अर्थात सरकार की नीति भी इसके लिए जिम्मेदार है जो सरकार के साथ ही बदल जाती है।


सामान्यत: जब कोई डेवलपर्स किसी शहर में अपनी परियोजना लाता है तो पहले उससे, उस शहर के विकास प्राधिकरण या संबोधित निगम में स्वयं को पंजीकृत कराना होता है। उसके बाद कन्सेप्चुअल प्लान जमा करना होता है अर्थात उसकी योजना क्या है? यह बताना पड़ता है। कन्सेप्चुअल प्लान स्वीकृत होने के बाद संबन्धित प्राधिकरण या विकास एजेंसी उस डवलपर्स को काम करने की स्वीकृति देती है और इस तरह बिल्डर्स चिन्हित क्षेत्र में लैण्ड खरीदने का कार्य शुरू करता है। लेकिन अधिकतर डेवलपर्स लैण्ड खरीदने से ज्यादा जोर अपने कन्सप्चुअल प्लान को अर्थात प्रोजेक्ट्स को बेचना शुरू कर देते हैं। इस तरह प्रोजेक्ट बेच दिया जाता है। लैण्ड पूरी खरीदी नहीं जाती। समय के साथ प्रोजेक्ट के लिए लैण्ड महंगी हो जाती है और प्रोजेक्ट फंस जाता है। यदि परियोजना 100 एकड़ से बड़ी होती है तो उसमें सरकार की नीति के अनुसार ६० से ७५ फीसदी जमीन डवलपर्स को स्वयं किसानों से खरीदने होती है औश्र शष लैंड यदि डवलपर्स खरदने असमर्थ रहता है सरकार अधिग्रहण करके देती है। सरकार द्वारा किया जाने वाला बची लैण्ड का अधिग्रहण आसान नहीं होता है। इस तरह के ज्यादा तर प्रोजेक्ट भी आधे अधूरे पड़े हैं। कुछ मामलों में डेवलपर्स निवेशकों एवं ग्राहकों के भरोसे प्रोजेक्ट्स लाते हैं। इस तरह के प्रोजेक्टस में निवेशक या उपभोक्ता फंस जाते हैं क्योंकि अक्सर इस तरह के प्राजेक्ट्स को इतना रिपॉन्स बाजार से नहीं मिल पाता जितनी उम्मीद डवलपर्स लगाए बैठा होता है।

यदि इन फाइलों में बनते-बिकते प्रोजेक्टस के खेल को रोकना है तो हमें प्रोफेशनल होना पड़ेगा। किसी भी उद्योग में पहले प्रोडेक्ट बनता है उसके बाद बेचा जाता है तो फिर रियल एस्टेट में ही प्रोडेक्ट अर्थात प्रोजेक्ट बनने से पहले बेचने का चलन क्यों है? इस पर रोक लगानी चाहिए। यदि आप कोई प्रोडेक्ट खरीदते हैं तो उस पर एक्साईज, क्वालिटी, क्वान्टिटी, वारंटी, एक्सपयरी, अधिकतम किमत जैसी तमाम जानकारी होती है और यदि जांच में उक्त प्रोडेक्ट पर दी जाने वाली जानकारी गलत पायी जाती है तो निर्माता एवं बेचने वाली कंपनी को सजा का प्रावधान है। लेकिन ये प्रावधान रियल एस्टैट में लागू क्यों नहीं है? रियल एस्टेट का माल इन सब जानकरियों के बिना कैसे सेल होता है? हर वस्तु पर उसकी अधिकतम कीमत अंकित होती है लेकिन रियल एस्टेट में अपार्टमेंट या प्लॉट की अध्कितम किमत क्रूों निश्चित नहीं होती? सबसे पहले सरकार यह तय करे कि कोई भूखण्ड या आवासीय योजना के कन्सेप्चुअल प्लान पर ही उनको बेचने का कार्य शुरू नहीं हो, परियोजना के प्रारंभ में होने व समाप्त होने की तिथि निश्चित हो और संबन्धित विभाग की जिम्मेदारी तय हो। देरी की स्थिति में सरकार दखल दे और प्रोजेक्ट को अपने हाथों में लेकर काम करे। हर प्रॉपर्टी की अधिकतम कीमत तय हो जिससे बिचौलियों एवं सट्टïोरियों, मुनाफाखोरों पर लगाम लगाई जा सके।

और एक निश्चित या तय ही कीमत से ज्यादा में प्रॉपर्टी बेचने पर कड़ी सजा का प्रावधान हो, जैसे उपाय करके फाइलों में बिकते बनते प्रोजेक्टस के खेल को रोका जा सकता है। नहीं तो आने वाले समय में हर डेवलपर्स के खिलाफ कोर्ट में मामला चल रहा होगा जो निवेशकर्ता एवं उपभोक्ता के साथ इस रियल एस्टेट इण्डस्ट्रीज के लिए भी खतरनाक व दुखदायी होगा।

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